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अम्बेडकर बने मुसलमानों के प्रतीक - डॉ उदित राज
16 March 2020

जब CAA/NRC लागू करने कि बात पैदा हुयी तब जामिया और अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में प्रतिरोध कि लहर उठी | जे एन यू भी कहाँ पीछे रहने वाला था | धीरे धीरे पूरे देश में इसका विरोध शुरू हुआ | पहले तो जामिया का विरोध प्रदर्शन केंद्र बना लेकिन कुछ दिन बाद ही शाहीनबाग़ का प्रतिरोध देश भर के लिए अनुकरणीय हो गया | शुरूआती दौर में प्रगतिशील , बुद्धिजीवी , राजनितिक एवं सामाजिक कार्यकर्त्ता सभी कि भागीदारी बढ़ चढ़ के हुयी | फिर भी भीड़ मुसलमानों कि ज्यादा रही | ट्रिपल तलाक और रामजन्म भूमि पर फैसले आदि से मुस्लिम समाज आहत तो था ही लेकिन प्रतिरोध नही किया पर CAA/NRC ने उन्हें मजबूर कर दिया कि वो अपने अस्तित्व कि लडाई लड़ें | इसी मध्य एक नया सामाजिक-राजनैतिक समीकरण देखने को मिला कि एक तरफ गांधीजी कि तस्वीर तो दूसरी तरफ बाबा साहब डॉ अम्बेडकर कि तस्वीर. पहली बार ऐसा हुआ कि अल्पसंख्यक एवं बुद्धिजीवी समाज में डॉ अम्बेडकर को अपनाया गया | दोनों कि दोस्ती जमीन पर पैदा हुयी और इसके बड़े राजनैतिक एवं सामाजिक परिणाम अवश्य होने वाले हैं| समय अंतराल प्रदर्शन में भीड़ कम होने लगी और मूल रूप से मुस्लिम समाज के हाथ में ही अब आन्दोलन चल रहा है | यह भी बात है कि कहीं न कहीं मुस्लिम समाज अब अकेला महसूस करने लगा है|

CAA/NRC के विध्वंशक परिणाम तो होने वाले ही हैं लेकिन, एक अछि बात यह हुयी है कि मुस्लिम समाज पहली बार अपने लिए इतने दमखम से मैदान में उतरा है| जब वह मैदान में उतरा है तभी तो दोस्त और दुश्मन कि पहचान कर पायेगा | अतीत में अपनी तमाम लड़ाइयों को वह लड़ा ही नहीं और अधिकतर असुरक्षा कि भावना कि वजह से राजनैतिक सक्रियता में नहीं था, इसलिए भाजपा के खिलाफ वोट देता रहा है| दलित-मुस्लिम एकता का प्रयास कई बार हुआ लेकिन बात आगे नहीं बढ़ी | बाबा साहब डॉ अम्बेडकर को बंगाल से दलित- मुसलमानों ने संविधान सभा में भेजा था और शुरुआत अछि हुयी लेकिन टिकाऊ नहीं रह पायी | योगेन्द्र नाथ मंडल का मोहभंग हुआ और पाकिस्तान से वापिस भारत आये | सन 1960 के दशक में बी पी मौर्या और संघप्रिय गौतम ने दलित-मुस्लिम कि राजनीति कि और कुछ हद तक सफल भी रहे लेकिन वो लम्बे समय तक कायम नहीं रह पायी| सुश्री मायावती ने बिजनौर से पहली बार जब लोकसभा का चुनाव जीता तो उसमें मुसलमानों का बहुत बड़ा योगदान था| अगर देखा जाय तो यह पहलकदमी दलितों कि तरफ से ज्यादा होती रही है| मुस्लिम समाज को सब्र से काम लेना होगा कि वो कभी दलित उत्पीडन या उसकी लडाई में साथ नहीं दिया | इसका मतलब यह नहीं कि ये दोस्ती अस्वाभाविक है , बल्कि मुस्लिम समाज खुद अपने मसलों पर भी नहीं लड़ा है |

मुसलमान के बाद अगर दुसरे नम्बर पर भागीदारी के लिए के CAA/NRC आन्दोलन में शामिल है तो वो दलित समाज है| संविधान का अनुच्छेद 15 में धर्म के आधार पर नागरिकता निर्धारित नहीं कि गयी है लेकिन CAA के बाद धर्म के आधार पर भी नागरिकता परिभाषित हो गयी है | बांग्लादेश , पाकिस्तान, अफगानिस्तान से प्रताड़ित मुस्लिम भारत में नागरिकता नहीं ले सकते बाकी शेष अन्य धर्म के लोगों के लिए भारतीय नागरिकता का दरवाजा खुला है| इससे दलित समाज भावुक रूप से आहत हुआ कि संघ/भाजपा संविधान को नष्ट करना चाहते हैं| 11 दिसंबर 1949 में संघ ने संविधान एवं बाबा साहब का पुतला जलाया था और सर संघ चालक गोलवलकर ने संविधान तैयार होने पर कहा था कि इसमें को हिन्दूपन नहीं है और डॉ अम्बेडकर ने दुनिया के और देशों के संविधान कि नक़ल करके इसे बनाया है. यह मुख्य कारण है कि सी ए ए / एन आर सी के खिलाफ दलित मुसलमानों के साथ दुसरे नम्बर पर खड़ा है| दूसरा यह है कि दोनों वर्गों कि धर्म छोड़कर के समस्याएँ एक जैसी हैं | एक कारण यह भी है कि बाबा साहब डॉ अम्बेडकर 14 अक्टूबर1956 को लाखों लोगों के साथ हिन्दू धर्म छोड़कर के बौध धम्म अपनाया था | शिक्षित और जागरूक दलित मनुवाद के खिलाफ स्वयम बहुत जागरूक है इसलिए हिंदुत्व के जाल में नहीं फंसता है| इस आन्दोलन से मुसलमानों को कुछ बदलाव आना चाहिए कि दलितों के साथ जब उत्पीडन हो या समस्या पर उनका साथ देना हो तो मुस्लिम समाज को सहयोगी बनना होगा |

वर्तमान में जो देश के कई हिस्सों में CAA/NRC के खिलाफ धरना चल रहा है और यह केवल मुस्लिम चेहरा ना बने तो उसके लिए मुसलमानों को अम्बेडकरवादी दलितों से संवाद करके शामिल कराना चाहिए | यह स्वाभाविक इसलिए है इनकी भी लडाई हिंदुत्व के खिलाफ है | बाबा साहब डॉ अम्बेडकर ने हिन्दू और मुसलमान दोनों पर करार प्रहार किया है इसलिए धर्म वाला पहलु छोड़कर मुस्लिम को डॉ अम्बेद्कर के सामाजिक एवं शैक्षणिक दर्शन से जुड़ना चाहिए| संघ और भाजपा के पास हिन्दू और मुस्लिम कराने के अलावा राजनैतिक सत्ता अपनाने का कोई और रास्ता नहीं है| इसके अलावा एक बहुत एहतियात बरतने वाली बात है कि उन समाज के नेताओं को आवश्यकतानुसार ही जगह दे जिनकी जाति कि वजह से संघ और भाजपा का दारोमदार टिका हुआ ह| संघर्ष में दलित –पिछड़े, छोटे-बड़े नेताओं एवं कार्यकर्ताओं को ज्यादा तवज्जो दें क्यूंकि इनके वोट भाजपा विरोधी हैं और भविष्य में भाजपा को इन जाति के नेताओं से ही कड़ी चुनौती मिलने वाली है| थोड़े समय के लिए मंच को आकर्षक और भीड़ को खीचने कि दृष्टि से उनको ही तवज्जो देते रहेंगे जो दस वोट नहीं दिला सकते और जनतंत्र में बन्दूक से सत्ता नहीं ली जाती है, बल्कि वोट से हासिल होती है| इसलिए जो समाज भाजपा के खिलाफ वोट दे संघर्ष का साथी उनको ही बनाएँ| इसकि कोई काट भाजपा के पास नहीं है|

(लेखक डॉ उदित राज, पूर्व लोकसभा सदस्य एवं कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं )