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क्या दलित पिछड़े कभी भारत में न्याय पा सकेंगे- डॉ. उदित राज
13 June 2020

उच्च न्यायपालिका के चरित्र को देखते हुए दलित, आदिवासी, पिछडो, अल्पसंख्यकों को न्याय पाना संभव नहीं है| इस कथन का सत्यापन करना मुश्किल नहीं है| हाल में DMK , IDMK ,CPM आदि पार्टियों ने मिलकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कि वो निर्देशित करे केंद्र सरकार को कि तमिलनाडु में मेडिकल और डेंटल में 50 फीसदी का आरक्षण छोड़े | सुप्रीम कोर्ट ने सन्दर्भ से बाहर जाकर के टिप्पणी किया कि आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं है| राहत देने के नाजाय याचिका को मद्रास हाई कोर्ट के दरवाजा खटखटाने के लिए कहा| गत दो दशक से उच्च न्यायपालिका संविधान से हटकर के सक्रिय हुयी है| संविधान में कार्यपालिका, विधायिका एवं न्यायपालिका तीनो में बड़ा नाजुक संतुलन बनाकर रखा गया है| जहाँ एक अंग अपनी सीमा को लांघता है, संतुलन बिगड़ जाना स्वाभाविक है | उच्च न्यायपालिका ने इस संतुलन को बिगाड़ रखा है. कुछ सालों से जनता कि आस्था जनप्रतिनिधियों में घटी तो उसका लाभ न्यायपालिका ने खूब उठाया | दूसरा कारण कि राजनितिक दलों कि आपसी फूट का भी फायदा सुप्रीम कोर्ट को मिला जिससे न्यायधीशों के खिलाफ अभियोग चलाना असंभव हो गया|

भाई –भतीजावाद प्रमुख कारण है इन वर्गों को न्याय नहीं मिल रहा है| देश के उच्च न्यायालयों में लगभग जज उन पृष्ठभूमि से आते हैं जिनके रिश्तेदार पहले जज रह चुके हैं | सुप्रीम कोर्ट में लगभग 35 फीसदी ऐसे ही जज हैं| क्या ये योग्यता परिवार या जाति मंक पैदा होने से ही आती है / ऐसा बिलकुल नहीं है | यहीं पर न्यायिक चरित्र का हनन होत्ता है और उस पृष्ठभूमि से आया जज कैसे दलित पिछड़े आदिवासी और अल्पसंख्यकों को न्याय दे सकता है| जब जाति के आधार पर नियुक्ति हुयी है तो स्वाभाविक है पक्षपात होना. दुसरा बड़ा करान यह है कि जज बनने के लिए योग्यता परिभाषित नहीं है | जिस व्यक्ति कि जज के पद पर नियुक्ति हो रही है उसे किसी स्पर्धा से नहीं गुजरना पड़ता है, ना ही उसका कोई साक्षात्कार होता है| उसके द्वारा किये गए मुकदमों कि गुणवत्ता का कोई मापदंड भी स्थापित नहीं है|

डॉ अम्बेडकर का कथन बहुत ही सान्दर्भिक हो जाता है उन्होंने १९४५ में बाम्बे विधान परिषद् में यह बात कही थी कि क्या मेरे दोस्त यह भरोसा दिला सकते हैं कि दलित पिछड़ों के मुकदमो में सारे जज निष्पक्ष रह सकते हैं | उन्होंने विस्तार से कुछ घटनाओं का भी जिक्र किया था जिसमे सवर्ण जज के द्वारा न्याय नहीं मिल सका था | इंसान और मशीन में अंतर होता है | मशीन को जिस तरह से प्रयोग करना हो उसी दिशा में काम करेगी , लेकिन मानव ऐसा नहीं कर सकता है. मानव जिस माहौल में पैदा हुआ है उस जाति परिवार के संस्कार से उसकी मानसिकता सृजित होती है. भले ही वह निष्पक्ष भी हो और जातिवादी भी न हो फिर भी उसके नजरिये और सोच में उसका मनोविज्ञान जरुर परिलक्षित होगा भले ही वो दावा करे कि वो जाति में बिस्वास नहीं करते लेकिन सैकड़ों पीढ़ियों से जाति का लाभ उसे मिला है|

वर्तमान हालत में न्यायपालिका कार्यपालिका के हाथों कि कठपुतली हो चुकी है हाल में रंजन गोगोई को राज्यसभा सदस्यता का पुरस्कार मिला | उन्होंने तो गिरने कि हर सीमा लांघ दी और यहाँ तक कह दिया कि परिस्थितियों को देखते हुए २०२४ में लोकसभा का चुनाव भी नहीं होना चाहिए| ऐसा व्यक्ति क्या अपने समय में संतुलित न्याय दे सका होगा| आज के हालात में जिस जाति का वर्चाश्व सत्ता में है मुक़दमे का फ़ैसला उनके ही इच्छाशक्ति पर निर्भर है और करेगा भी | सत्ता का चरित्र पूरी तरह से सवर्णवादी है ऐसे में दलितों- पिछड़ों को कहाँ न्याय मिल्लने वाला है | जातिवाद तो इस कदर पसरा है कि सवर्णों को वकील करने कि भी जरुरत नहीं है उनकी बिरादरी के जज वकील और जज बन जा रहे हैं| इस बात का ताज़ा उदाहरण तमिलनाडु में विभिन्न पार्टियों द्वारा दाखिल कि गयी याचिका पर फ़ैसला और टिप्पणी है|

न्यायपालिका का चरित्र संवैधानिक ना होकर के जाति व्यवस्था का हो चुका है| संविधान में विधायिका के द्वरा बनाए गए कानून को लागू करवाने का कानून न्यापालिका का है ना कि कानून बनाने का| हो यह रहा है कि संसद से ज्यादा कानून बनाने का कार्य सुप्रीम कोर्ट करने लगा है जबकि उसका कार्य कानून कि व्याख्या करना है | न्याय इतना महगा हो गया है कि दलित पिछड़े बड़े वकीलों कि लम्बी चौड़ी फीस नहीं दे सकते और जजों का तो भाव ही बहुत ज्यादा है | सामजिक एवं धार्मिक कारण के अलावा आर्थिक कारण भी है जिससे इनको न्याय नहीं मिल सकता |

जीते कारक उल्लिखित किये गए हैं| जिसकी वजह से इन वर्गों को न्याय नहीं मिल सकता है ये अकाट्य हैं| जिस लालू यादव ने चारा घोटाले कि जांच का आदेश खुद दिया उनको जेल में और जिस महाशय , जगान्नाथ मिश्र के समय शुरू हुआ उनको बेल दिया गया | मनु शर्मा को आचरण अच्छा बताते हुए समय से पहले छोड़ दिया गया और विकास यादव उसी तरह के इल्जाम में सजा कम नहीं हुयी| एनसीआरबी की 2015 की प्रिजन स्टेटिस्टिक्स के मुताबिक, उस साल करीब 21 फीसदी कैदी दलित थे, जो देश में उनकी आबादी (16.2 फीसदी) से ज्यादा है. वहीं 2014 के मुकाबले उनकी संख्या में थोड़ी वृद्धि हुई थी| वहीं आदिवासी कैदियों की संख्या में 2015 में करीब 18 फीसदी (2,805 कैदियों) की बड़ी वृद्धि हुई थी| कुल कैदियों में आदिवासी करीब 14 फीसदी थे, जो देशे में उनकी आबादी (8.2 फीसदी) से ज्यादा है| हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, 2015 की अपनी विवादास्पद रिपोर्ट के बाद इस बार एनसीआरबी ने डेटा को धर्म और जाति के आधार पर नहीं बनाया है|

मंडल कमीशन में फैसले के समय आरक्षण सीमा पचास फीसदी लगायी गयी थी जो स्वतः न्यायपालिका कि तरफ से किया गया था जबकि संसद के द्वारा इस तरह का कोई कानून नहीं बना था | बार-बार कई फैसले में दलित पिछड़ों के आरक्षण का मामला आता है स्वयम कि बनायीं हुयी पचास फीसदी कि लक्षमण रेखा उद्धरीत कर देते हैं| जब गरीब सवर्णों को आरक्षण मिला तप पचास फीसदी आरक्षण कि सीमा टूट गयी| देश के किसी न्यायाधीश को पचास फीसदी कि सीमा यद् नहीं आयी क्यूंकि वो उनकी जाति के हित में था| न्यायपालिका के द्वारा समय समय पर दिए गए निर्णय और संविधान कि गलत व्याख्या करने कि वजह से पंद्रह फीसदी सवर्णों का अघोषित पचास फीसदी आरक्षण हो गए|

{ लेखक डॉ उदित राज परिसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष, पूर्व लोकसभा सदस्य और वर्तमान में कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं }